SURYA NEWS INDIA

दिल्ली हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला | कोमा में पड़े पति के शुक्राणु से पत्नी बनेगी मां

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक संवेदनशील मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कोमा जैसी स्थिति (पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट) में पड़े भारतीय सेना के एक जवान के शुक्राणु निकालकर क्रायोप्रिजर्व (फ्रीज) करने की अनुमति दे दी है। इससे उनकी पत्नी इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) प्रक्रिया के जरिए मां बन सकेंगी।न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता पत्नी की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि पति ने पहले ही IVF प्रक्रिया शुरू करने के लिए सहमति दे रखी थी, इसलिए लिखित अनुमति के अभाव में भी इसे वैध माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी को मात्र इस आधार पर मां बनने के मौलिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “प्रजनन का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और कानून की व्याख्या ऐसी होनी चाहिए जो इस अधिकार को बढ़ावा दे।” साथ ही, पूरी प्रक्रिया अन्य सभी मेडिकल शर्तों और Assisted Reproductive Technology (ART) अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप ही आगे बढ़ेगी। पत्नी की सहमति को पति की ओर से वैध सहमति माना जाएगा।


याचिकाकर्ता दंपति ने मार्च 2017 में विवाह किया था। जून 2023 में दोनों ने आपसी सहमति से IVF के जरिए संतान प्राप्त करने का फैसला लिया था। लेकिन जुलाई 2025 में जम्मू-कश्मीर के डूधगंगा क्षेत्र में गश्त के दौरान पति (सेना जवान) काफी ऊंचाई से गिर गए, जिससे उन्हें गंभीर ट्रॉमेटिक ब्रेन इंजरी हुई। वे तब से आर्मी अस्पताल में कोमा जैसी स्थिति में हैं और डॉक्टरों के अनुसार उनके न्यूरोलॉजिकल रिकवरी की कोई संभावना नहीं है। इस दौरान IVF प्रक्रिया रुक गई, जिसके बाद पत्नी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने संविधान के तहत मातृत्व, गरिमा और प्रजनन स्वायत्तता के अधिकार का हवाला देते हुए राहत मांगी। कोर्ट ने कहा कि दंपति ने पहले ही IVF शुरू करने का फैसला लिया था और रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है कि पति ने सहमति वापस ली हो। इसलिए, पत्नी की याचिका को स्वीकार करते हुए शुक्राणु निकालने और संरक्षित करने की अनुमति दे दी गई।

Leave a Comment

error: Content is protected !!