
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के उस विवादास्पद फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें ग्राम प्रधानों के कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें ही पंचायतों का प्रशासक नियुक्त करने का प्रावधान किया गया था। अदालत ने इस फैसले को प्रथम दृष्टया असंवैधानिक करार दिया है। हाईकोर्ट की एकलपीठ ने अरविंद राठौर द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार के इस आदेश पर तत्काल रोक लगा दी। कोर्ट ने कहा कि प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने का प्रावधान संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत प्रतीत होता है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई को तय की है और सरकार से जवाब तलब किया है।उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों के चुनाव तय समय पर न हो पाने की स्थिति में सरकार ने हाल ही में एक आदेश जारी कर कार्यकाल पूरा कर चुके प्रधानों को ही प्रशासक के रूप में नियुक्त करने का प्रावधान किया था। इससे पहले के कई मामलों में भी पंचायतों में प्रशासक नियुक्त किए जाते रहे हैं, लेकिन इस बार पूर्व प्रधानों को ही यह जिम्मेदारी सौंपी जाने का फैसला विपक्षी दलों और कई याचिकाकर्ताओं द्वारा असंवैधानिक बताया गया। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह व्यवस्था लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है और पंचायती राज व्यवस्था में पारदर्शिता तथा निष्पक्षता को प्रभावित करेगी।सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि बिना चुनाव कराए या उचित प्रक्रिया अपनाए पूर्व प्रधानों को प्रशासक बनाना उचित नहीं है। अदालत ने पंचायत चुनावों की समय सीमा और प्रशासक नियुक्ति की वैधता पर भी सवाल उठाए। इस फैसले से प्रदेश के हजारों ग्राम पंचायतों में प्रशासनिक संकट गहरा गया है। कार्यकाल समाप्त होने के बाद अब इन पंचायतों का संचालन कैसे होगा, इस पर सरकार को जल्द कोई वैकल्पिक व्यवस्था सोचनी होगी। विपक्षी दलों ने हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने इसे लोकतंत्र की जीत बताया और सरकार पर पंचायत चुनाव कराने में देरी का आरोप लगाया। सत्ताधारी दल के नेताओं का कहना है कि यह अंतरिम रोक है और अंतिम फैसले का इंतजार किया जाएगा। प्रदेश में पंचायत चुनावों को लेकर पहले से ही चर्चाएं चल रही हैं। हाईकोर्ट का यह आदेश चुनाव आयोग और राज्य सरकार दोनों पर दबाव बढ़ाएगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट का पूरा आदेश जारी होने के बाद स्थिति और स्पष्ट होगी। 13 जुलाई को मामले की अगली सुनवाई में अंतिम फैसला आने की संभावना है।






