
अति सघन बागवानी अमरूद रोपण की एक नई विधि है। यह भारत में पहली बार भाकृअनुप-केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ में विकसित की गई है। इसके अंतर्गत 2.0 X 1.0 मीटर की दूरी पर प्रति हैक्टर 5000 पौधे लगाए जा सकते हैं। इसमें पौधों का कैनोपी प्रबंधन नियमित रूप से कटाई-छंटाई द्वारा किया जाता है। इससे फलस्वरूप सूर्य की किरणों का बेहतर प्रवेश होता है और प्रकाश संश्लेषण की दर में वृद्धि होती है, जिससे प्रति इकाई क्षेत्र में अधिक उपज प्राप्त होती है। अति सघन बागवानी, उच्च उत्पादकता के साथ उच्च गुणवत्तायुक्त अमरूद उत्पादन की पद्धति है।
अति सघन बागवानी में कैनोपी प्रबंधन
अति सघन बागवानी में रोपण 2.0 मीटर (पंक्ति से पंक्ति) X 1.0 मीटर (पौधे से पौधे) की दूरी पर किया जाता है। इसमें 5000 पौधे प्रति हैक्टर लगाए जा सकते हैं। अगर किसान प्रारंभ से ही पौधों की अच्छी देखभाल करें, तो उन्हें पारंपरिक तकनीक से अधिक मुनाफा मिल सकता है। अमरूद की अति सघन बागवानी में पौधों की कई बार कटाई-छंटाई कर उनका फैलाव, ऊंचाई, चौड़ाई और आकार नियंत्रित किया जाता है, इसे ही कैनोपी प्रबंधन कहते हैं।
अति सघन बागवानी के प्रमुख घटक
अति सघन रोपण पद्धति में निम्नलिखित घटक होते हैं:
• उच्च उपज देने वाली बौनी किस्मों का चयन बौने मूलवृत्तों (रूटस्टॉक) का प्रयोग जैसे अमरूद में बौनी रूटस्टॉक किस्म पूसा श्रीजन
• पेड़ों की उचित कटाई-छंटाई करना
• उचित पादप वृद्धि नियामकों का उपयोग
• रोगों और कोटों का उचित नियंत्रण करना
• उपयुक्त एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन और
• एकीकृत जल प्रबंधन को अपनाना
अति सघन बागवानी के लाभ
• भूमि और संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग होना
• प्रति इकाई क्षेत्र में अधिक पौधों के साथ उच्च गुणवत्ता वाले फल का प्राप्त होना
• कटाई में आसानी और फलों की तुड़ाई में कम लागत
• नियमित रूप से कटाई-छंटाई के फलस्वरूप अधिक फल देने वाली शाखाओं का आना
• सूर्य की किरणों का बेहतर उपयोग तथा प्रकाश संश्लेषण में वृद्धि
• कीट और रोग नियंत्रण के लिए रसायनों के छिड़काव में आसानी
• टपक सिंचाई, पानी में घुलनशील उर्वरकों और यंत्रीकरण जैसी- आधुनिक तकनीकों का बेहतर उपयोग होना
• अधिक प्रारंभिक आय की प्राप्ति
• छंटाई की गई पत्तियों का उपयोग, पलवार और जैविक खाद के रूप में होना। इससे न केवल मृदा की उर्वरा क्षमता में सुधार और जल का संरक्षण होता है, बल्कि उत्पादन की लागत भी कम हो जाती है।
रवि प्रताप, शोध छात्र, फल विज्ञान (हॉर्टिकल्चर), चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय कानपुर




