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मछली पालन से बढ़ रही किसान की आमदनी और आत्मनिर्भरता

भारत में पिछले कुछ दशकों में मत्स्य उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2013-14 से 2023-24 के बीच मछली उत्पादन में लगभग 79.66 लाख टन की बढ़ोतरी हुई, जिससे कुल उत्पादन बढ़कर 175.45 लाख टन पर पहुँच गया। इस प्रगति से करीब 63 लाख मछुआरों और मत्स्य पालन से जुड़े लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ है। राज्यवार स्थिति देखें तो बिहार में उत्पादन 2013-14 के 2.68 लाख टन से बढ़कर 2023-24 में 8.73 लाख टन हो गया। यहाँ छोटे किसानों और महिला उद्यमियों को प्रतिवर्ष ₹13–18 लाख तक की आय हो रही है। कई उद्यमियों ने मछली हैचरी, बायोफ्लॉक तकनीक और पुनःपरिसंचरण जलीय कृषि प्रणाली (RAS) अपनाकर उत्पादन और मुनाफे में वृद्धि की है। पंजाब में “नीली क्रांति” के अंतर्गत 2020-21 में 1,64,879 टन उत्पादन हुआ था, जो 2024-25 में बढ़कर 2,00,003 टन हो गया। यहाँ के किसान प्रति हेक्टेयर ₹1.5–2 लाख सालाना कमा रहे हैं, जबकि कैटफिश पालन करने वालों को बाजार में ₹600–700 प्रति किलो का मूल्य प्राप्त हो रहा है। भारत सरकार ने मत्स्य क्षेत्र को प्रोत्साहन देने हेतु प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत ₹20,000 करोड़ से अधिक का निवेश किया है। इस योजना का लक्ष्य 2024-25 तक उत्पादन को 22 मिलियन टन तक पहुँचाना और लाखों नए रोजगार सृजित करना है। योजना के तहत तालाब निर्माण, मत्स्य बीज-आहार आपूर्ति, कोल्ड चेन, मार्केटिंग, फीड उत्पादन आदि के लिए वित्तीय सहायता और सब्सिडी दी जा रही है। साथ ही, FIDF (मत्स्य पालन एवं जलीय कृषि अवसंरचना विकास कोष) और RKVY (राष्ट्रीय कृषि विकास योजना) जैसी योजनाएँ भी इस क्षेत्र में योगदान दे रही हैं। तकनीकी नवाचार इस विकास की प्रमुख नींव बने हैं। बायोफ्लॉक तकनीक से सूक्ष्मजीव मछलियों को पोषण देते हैं, जिससे फीड लागत घटती है और जल की गुणवत्ता सुधरती है। RAS प्रणाली जल की बचत करती है, रोगों पर नियंत्रण रखती है और सीमित संसाधनों में उच्च उत्पादन संभव बनाती है। वहीं, इंटीग्रेटेड मल्टी-ट्रॉपिक एक्वाकल्चर (IMTA) में विभिन्न प्रजातियों का संयुक्त पालन होता है, जिससे पर्यावरणीय संतुलन और किसानों की आय दोनों में लाभ मिलता है।

डिजिटल तकनीक के प्रयोग ने इस क्षेत्र को आधुनिक बनाया है। अब पानी का तापमान, पीएच स्तर, आहार प्रबंधन और रोग पहचान डिजिटल सेंसर और इंटरनेट आधारित उपकरणों से संभव है, जिससे उत्पादकता और वृद्धि में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है। पश्चिम बंगाल में भारतीय मेजर कार्प के मिश्रित पालन से निवेश पर ₹1.24 की वापसी मिल रही है। कर्नाटक में मत्स्य तालाबों से प्रति हेक्टेयर ₹3.36 से ₹8.24 लाख तक की शुद्ध आय और 2.44–2.77 का लाभ-लागत अनुपात दर्ज हुआ है। यदि किसान मुर्रेल (सोल) मछली का पालन करें तो दूसरे वर्ष से ही ₹4.2–5.46 लाख का वार्षिक लाभ अर्जित कर सकते हैं, और कुल आय लगभग ₹10 लाख तक पहुँच सकती है। स्पष्ट है कि भारत में मत्स्य पालन आय दोगुनी करने का एक सशक्त साधन है। यदि किसान सरकारी योजनाओं का लाभ उठाएँ, तकनीकी नवाचार अपनाएँ, विविध मॉडल विकसित करें और मूल्य वर्धन व विपणन रणनीति पर ध्यान दें, तो उनकी आय दोगुनी से भी अधिक हो सकती है।

लेखक: सत्यवीर सिंह, केरल मत्स्य पालन और महासागर अध्ययन विश्वविद्यालय, एर्नाकुलम, केरल

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