
लखनऊ। उत्तर प्रदेश पुलिस अब दहेज, मानहानि, चेक बाउंस और घरेलू हिंसा समेत कुल 30 प्रकार के मामलों में सीधे एफआईआर दर्ज नहीं करेगी। पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्ण ने सभी पुलिस अधिकारियों को सख्त निर्देश जारी कर स्पष्ट किया है कि जिन अपराधों में कानून केवल परिवाद (शिकायत) दायर करने का प्रावधान रखता है, उनमें एफआईआर दर्ज करना पूरी तरह नियम-विरुद्ध है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ द्वारा इस मुद्दे पर गंभीर आपत्ति जताए जाने के बाद डीजीपी ने पूरे प्रदेश के पुलिस महकमे को तुरंत ये दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

डीजीपी राजीव कृष्ण ने कहा, “कई बार पुलिस बिना कानूनी प्रावधान के एफआईआर दर्ज कर लेती है, जिससे आरोपी को अदालत में लाभ मिल जाता है और जांच प्रक्रिया प्रभावित होती है।” उन्होंने सभी थाना प्रभारियों, विवेचकों और वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देश दिया कि कोई भी एफआईआर दर्ज करने से पहले अनिवार्य रूप से यह जांच करें कि संबंधित मामले में एफआईआर दर्ज करने का कानूनी प्रावधान है या नहीं। डीजीपी के निर्देश के अनुसार निम्नलिखित मामलों में अब केवल अदालत में परिवाद दायर किया जाएगा।
दहेज से संबंधित मामले (धारा 498-ए सहित)
मानहानि के मामले
घरेलू हिंसा अधिनियम (Domestic Violence Act)
निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट (चेक बाउंस)
माइंस एंड मिनरल्स एक्ट
कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट
पशुओं के साथ क्रूरता से जुड़े मामले
इनके अलावा कुल 30 अलग-अलग कानूनों में केवल परिवाद दाखिल करने का ही प्रावधान है।
निर्दोष लोगों को अनावश्यक परेशानी से बचाना
पुलिस संसाधनों का सही उपयोग सुनिश्चित करना
अदालती प्रक्रिया को मजबूत बनाना
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन
डीजीपी ने सभी अधिकारियों को चेतावनी देते हुए कहा है कि कानून का गहन अध्ययन करें और उसी के अनुसार कार्रवाई करें। गलती करने वाले थाना प्रभारी और विवेचक जवाबदेह ठहराए जाएंगे।
यह फैसला उत्तर प्रदेश पुलिस में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। पुलिस विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पुलिस पर अनावश्यक बोझ कम होगा और गंभीर अपराधों पर फोकस बढ़ेगा।






